گرو درشن

راماشرم ستسنگ، متھرا ادبیات

हमारी शैली और विशेषतायें

यह सभी कहते चले आ रहे हैं कि ईश्वर का निवास मनुष्य के हृदय में है। शास्त्रों ने यह शिक्षा दी है कि उसे अपने अंदर ही खोजो जो तुम्हारे अत्यन्त समीप और छोटी शक्ल में है, उसे ही पकड़ने की कोशिश करो।

यह काम हमारे यहाँ इतनी सुगमता से हो जाता है कि जिसको सुनकर लोगों को आश्चर्य हो सकता है। स्त्री-पुरुष, वृद्ध-युवा, विद्वान और कुपढ़, गृहस्थ और विरक्त, ऊँच जाति और नीच जाति इत्यादि सभी इसको बड़ी आसानी से कर सकते हैं। धर्म और मज़हब भी इसमें बाधा नहीं डालता क्योंकि जहाँ मज़हब की सीमा समाप्त होती है, वहाँ से आगे इसका आरम्भ होता है।

प्रथम बैठक से ही साधक यह अनुभव करने लगता है कि उसका मन किसी शक्ति द्वारा जकड़ दिया गया है, उसका वेग और उसकी चंचलता नष्ट हो गई है और वह अपने कार्य में कोई विघ्न नहीं डाल रहा। नित्य-प्रति के अभ्यास से यह अवस्था और बढ़ती जाती है और थोड़े ही काल में वह समाधि का आनंद लूटने लगता है।

पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित परमार्थ पथ के दस आलोक

1
ईश्वर तो एक शक्ति (पावर) है, न उसका कोई नाम है न रूप। जिसने जो नाम रख लिया वही ठीक है।
2
उसके प्राप्त करने के लिए गृहस्थी त्याग कर जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं है, वह घर में रहने पर भी प्राप्त हो सकता है।
3
अभी तुमने ईश्वर देखा नहीं है, इसलिए उसे प्राप्त करने के लिए पहले उससे मिलो जिसने ईश्वर देखा है। वही तुम्हें ईश्वर का दर्शन करा सकता है।
4
अपने जीवन में आंतरिक प्रसन्नता लाओ। यह बहुत बड़ा ईश्वरीय गुण है।
5
ज्ञान में शांति है, वह तुम्हें बाहर से नहीं मिलेगी। ज्ञान अंतर में है। उसके लिए आंतरिक साधन करने होंगे।
6
अधिक समय तुम संसार के कामों में लगाओ, थोड़ा समय इधर दो। लेकिन इतने समय के लिए तुम संसार को भूल जाओ।
7
दो काम साधक के लिए बहुत ही आवश्यक है – एक तो अपने परिश्रम से भोजन कमाना और दूसरा अपने मन को हर समय काम में लगाये रखना।
8
ज्ञान अनंत है। यदि एक गुरु उसे पूरा न कर सके तो दूसरे गुरु से प्राप्त करना चाहिए। परन्तु पूर्ण आत्म ज्ञानी गुरु मिल जाने पर दूसरा गुरु नहीं करना चाहिए।
9
दुनिया के सारे काम करो लेकिन सेवक बनकर, मालिक बनकर नहीं।
10
संसार में मेहमान बन कर रहो। यहाँ की हर वस्तु किसी और की समझो। मैं और मेरा छोड़कर तू और तेरा का पाठ सीखो।

ब्रह्मलीन परम भागवत पण्डित मिहीलाल जी शर्मा द्वारा प्रतिपादित परमानंद प्राप्ति के नियम

1
किसी साथी की अवश्य तलाश कर लेना। जब सच्चा साथी मिल जाए तो उसपर श्रद्धा और विश्वास लाना। उसकी आज्ञा का पूर्ण पालन करना।
2
परमात्मा आनंद स्वरूप है, परमानन्द है, अतः पूर्ण प्रसन्न वही रह सकते हैं जो उससे सम्बंधित हो गए। उसे पाकर सभी प्रकाश फीके पड़ गए। इसलिए सन्त सदैव प्रसन्न रहते हैं।
3
इस मार्ग पर चलने वाले की लोग बड़ी प्रशंसा करते हैं, आदर देते हैं। यदि तुम उनकी बातों की ओर गए तो मार्ग से भटक जाओगे।
4
यदि तुम्हारे मन में यह अहम् जाग्रत हुआ कि अरे! मैं तो धर्म के मार्ग पर जा रहा हूँ, बस दूसरे मार्ग पर चले जाओगे।
5
इस मार्ग पर चलने वालों का आगे चलकर ऋद्धियाँ स्वागत करती हैं। तुम जो चाहो वही लो। यदि कुछ स्वीकार कर लिया तो वहीं रह जाओगे।
6
तुम्हें सिद्धियाँ आकर दर्शन देंगी। "तुम जो चाहो बन जाओ" के उपहार देंगी। यदि कोई स्वीकार कर लिया तो आगे का मार्ग रह जायेगा। इतने पर भी तुम अपने पथ प्रदर्शक (गुरु) के चरणों को देखते चले गए, तो बहुत आगे निकल जाओगे, वहां अच्छे-अच्छे योगी भी नहीं जा सकते।
7
गुरु ने तुम्हें जो वस्तु दी है, वह अनेक धनों से भी महान है, अनेक वैभवों से भी बड़ी है। यह वह अमृत है, जो मृत्यु के दुःख से भी बचा देता है। इसलिए इसे बड़ा छिपाकर रखो। न मालूम उनकी कृपा कैसे हो गई कि यह परम धन, परमानंद तुम्हें प्राप्त हुआ।

تازہ ترین مضامین

سب دیکھیں
محبت کا منبع سادگرو

محبت کا منبع سادگرو

محبت کا منبع سادگرو، اس کائنات میں کوئی بھی راستہ، ج؟......

مزید پڑھیں

శిష్యుడు అంటే ఎవరు ?

శిష్యుడు అంటే ఎవరు ? शिष्य कौन ఇంతకు ముందు అధ్యాయాలలో మేము సంత్ మతము, సంత్ జ??......

مزید پڑھیں

సంత్ యొక్క స్పర్శ

ఈ సమావేశం ఏదైతే జరుగుతోందో, అది వసంత పంచమి శుభ సందర్భాన జరుగుతున్నది అని మ??......

مزید پڑھیں
సమర్పణము

సమర్పణము

మనమందరమూ ఏ సాధనైతే చేస్తున్నామో, దానిలో పూర్ణత్వము, సమర్పించడములోనే ఉంది. ......

مزید پڑھیں

Amrit ki oor

అమృతం వైపు Amrit ki oor సాధారణముగా మనము వింటూనే ఉంటాము మనిషి జన్మ చాలా భాగ్యం  తో ల......

مزید پڑھیں

Kahat Na Aave Bain

कहत न आवे बैन వర్ణనాతీతము ఆ పరబ్రహ్మ పరమేశ్వరుడి ఒక అందమైన రచనే,ఈ సృష్టి. మహ......

مزید پڑھیں