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सच्चे गुरु की पहिचान क्या है?

प्रत्येक व्यक्ति यह जानना चाहता है कि गुरु का स्वरुप क्या होता है? हम कैसे पहिचानें कि जिसे हम गुरु बनाना चाह रहे हैं उनमे कौन से गुण आवश्यक हैं|

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गुरुं प्रशान्तं भवभीति नाशं विशुद्ध बोधं कलुषापहारं |
आनंद रूपं नयनाभिरामं श्री सत्य देवं नितरां नमामि ||
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इसके लिए हमारे गुरु महाराज कहते हैं – गुरु का पहला स्वरुप प्रशांत है| जैसे एक वृक्ष के पास, किसी भी भाव से कोई जाकर बैठ जाए उसका विरद है – छाया देना| कितना ही दु:खी व्यक्ति हो, गुरु उसे शांत कर देता है, अर्थात् जहां बैठने से, अंतर शांत हो जाता है| हमारा मन व आत्मा शांत हो जाते हैं| यही गुरु की
पहिचान है |
वे भव भीति का नाश करते हैं| भव का अर्थ है हो जाना| संसार में भय है नहीं, बन गया है| जैसे अँधेरे में रस्सी देख साँप समझकर डर गए| एक कमरा है जिसमे सारी सुख सुविधा की सामग्री रही हुई है जैसे सोफा सेट , फ्रिज , टी.वी. परन्तु वहां अन्धकार है जिसके कारण कमरे में प्रवेश करते ही हाथ पैर में ठोकर लग जाती है और जैसे लाइट का स्विच दबाया, उजाला हो गया| कमरे के प्रकाशित होते ही अन्धकार दूर हो गया असलियत पता चल गई और डर दूर हो गया बड़ी प्रसन्नता मिली| अर्थात् जो संसार में भय बन गया है उसका नाश करने वाले गुरु हैं|
विशुद्ध बोधम् – गुरु विशुद्ध बोध हैं अर्थात् ज्ञान का जो बोध कराये उसे गुरु कहते हैं | दोनों नेत्रों से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं वह बुद्धि का विषय है| परन्तु बोध जो है वह आत्मा का विषय है| कभी ध्यान के बाद जो आनंद की अनुभूति होती है वह बोध है| जिसे शब्दों द्वारा वर्णित नहीं किया जा सकता है| गुरु के पास बैठने से जिस आनंद की अनुभूति होती है वह वर्णनातीत है|
गुरु कलुषापहार होते हैं --- अर्थात् सारे पाप क्षय कर देते हैं| जब गुरुतत्त्व किसी में गुरु कृपा से प्रकट हो जाए तो वह गुरु कहलाता है|
भगवान् का जो मानवीय स्वरूप है वह गुरु का स्वरुप है| उनके दरबार में कोई भेद नहीं होता — दुष्ट या सज्जन, पात्र या कुपात्र| यहाँ घृणा तो है ही नहीं| उसका स्वरूप स्नेह है, वे सभी से स्नेह करते हैं | सभी के लिए दया ममता वत्सलता है उनमे तो| कोई अपना पराया नहीं| पल भर में दुष्टों के हृदय को धो डालते हैं| यही कारण है कि गुरु की दृष्टि पड़ जाए तो हृदय निर्मल हो जाता है| ऐसा ही गुरु का स्वरुप है जिसमे स्नेह है, ममता है, लेकिन सबसे बड़ा गुण है वत्सलता का रूप— माँ का रूप| जहाँ न अपने-पराये न अच्छे न बुरे, न सज्जन न दुर्जन, न माफी किसी से, कोई भेद नहीं, वे आत्मा देखते हैं शरीर नहीं| उनके पास वह अंतर्दृष्टि है जिससे वे जानते हैं कौन व्यक्ति आत्मा में बैठा है| आँखों से बरसते हुए उस प्रेम, प्रमुग्ध चित्त द्वारा हम गुरु को पहिचान सकते हैं|