प्रेम का स्रोत सद्गुरु
इस ब्रह्मांड में कोई भी मार्ग, ज्ञान, कर्म, योग, तंत्र या भक्ति का मार्ग हो, परम प्रेम के बिना ईश्वर की प्राप्ति आकाश के फूलों की तरह प्रतीत होती है। महात्मा कबीर जैसे संत को ये सब ज्ञात होते हुए भी, अपने अंतर्मन को प्रकट करते हुए मानव मात्र को यही संदेश दे रहे हैं ---
पुस्तकें पढ़-पढ़कर जग मुआ, पंडित भय न कोई।
धाई आखर प्रेम का पढ़ै, सो पंडित होई।।
बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़कर कितने लोग चले गए, लेकिन कोई विद्वान नहीं बन सका। दो अढ़ाई अक्षरों 'प्रेम' को पढ़ने वाले, उसके तात्पर्य को समझने वाले, पंडित बन गए।
उस "दो अढ़ाई अक्षरों के प्रेम" को पढ़ना है, पढ़ना ही नहीं, हमें उसे करना है, और करने के बाद उसे अपने अंतरों में समाहित करना है, उस रंग में हमें पूरी तरह लयबद्ध करना है। जैसे गुरु महाराज ने पांडवों, कौरवों को सत्य बोलने, धर्म का पालन करने और स्वाध्याय में प्रमाद न करने का पहला पाठ कंठस्थ करने के लिए दिया, तब सभी राम चिलक की तरह कंठस्थ करके गुरु जी को अर्पित कर दिए। लेकिन युधिष्ठिर ही सबकी तरह सुनाने में असमर्थ रहे, उनके लिए सत्य बोलना अंतरों में भरना आवश्यक था, अंत में अंतरों में समाहित होने में सफलता मिली। इसी तरह उस दो अढ़ाई अक्षरों के "प्रेम" को हमारे अंतरों में लयबद्ध करना है। इसलिए सहजों बाई जैसे गुरु भक्त इस प्रकार संकेत कर रहे हैं।
प्रेम प्रेम सब ही कहे, प्रेम न चिन्हे कोय।
आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय।।
तात्पर्य—प्रेम-प्रेम कहते हैं, लेकिन प्रेम किसी को ज्ञात नहीं। जो आठ पहर (इस ईश्वर में) निमग्न रहते हैं, वही प्रेम है। ईश्वर प्रेममय है। यह जीवात्मा ईश्वर का अंश है। अंश के गुण अंश में स्वाभाविक रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
प्रेम हरि का रूप है, त्यो हरि प्रेम स्वरूप।
एक होई, द्वै यो लसै, ज्यो सूरज अरु धूप।।
प्रेम हरि का रूप है, और हरि भी प्रेम का स्वरूप है, एक ही वस्तु है लेकिन देखने में दो लगते हैं, जैसे सूर्य की गर्मी।
परम समर्थ गुरु महाराज की वाणी में प्रेम का संक्षिप्त अवलोकन करें। "भक्ति एक वस्तु है, जबकि प्रेम दूसरी वस्तु। भक्ति साधना है, जबकि प्रेम सिद्धि। जो लोग भक्ति को ही प्रेम समझते हैं, वे गलत कर रहे हैं। ज्ञान, भक्ति और योग जहाँ समाप्त होते हैं, वहीं प्रेम का उदय होता है। प्रेम में कर्म नहीं होता, विचार नहीं होता, केवल प्रिय का स्मरण, मिलने की तीव्र इच्छा होती है। प्रेम रस का एक बूँद भी गले से नीचे उतर जाए तो नशा चढ़ जाता है। यही वेदों का सोमरस है, प्रेम में अहंकार समाप्त हो जाता है, बुद्धि उस स्थान पर नीचे रह जाती है, विचार, विवेक शांत हो जाते हैं। प्रेम में आकर्षण है, आनंद है। प्रेम ही आनंदमय कोश है।"
जहाँ बाज़ बासा करै पंछी, रहत न कोय।
प्रेम भाव प्रकाशिय, सब कछु गय बिगोय।।
जहाँ डाकपक्षी निवास करता है, वहाँ कोई और पक्षी नहीं होता।
जहाँ प्रेम भाव प्रकट होता है, वहाँ और कुछ नहीं बचता।
प्रेम एक कैनवास है, जिसे प्रकृति ने अलंकृत किया है और प्रेमियों की कल्पनाओं ने तराशा है – एक विचारक वोल्टेयर।
खलील जिब्रान जैसे विचारकों ने लिखा - 'जब प्रेम तुम्हें बुलाने का संकेत देता है, तब उसके अनुचर बन जाओ, चाहे वह धरती कितनी भी पत्थरों से भरी हो और कितनी भी कठिनाई भरी राह हो, जब वह अपनी पंखों से तुम्हें ढकने के लिए फैलाता है, तब तुम उसमें समा जाओ, उसमें मौजूद कांटों के कारण तुम्हारा शरीर घावों से भरा हो जाए, फूल तो कांटों में ही होते हैं, उन कांटों से उनकी रेशे घायल हो जाएं, फिर भी उनमें आपसी प्रेम होता है, वह तो उन कांटों में ही खिलता है, चिर हंसता है, मज़बूती से हंसता हुआ प्रतीत होता है, वह उसमें ही आनंदित होता है, उसके लिए उन कांटों के साथ प्रेम है, जैसे चातक पक्षी को उसकी प्रिय स्वाति नक्षत्र के बादलों में दोष दिखाई देते हैं।
चढ़त न चातक चित कबहु प्रिय पयोध के दोस।
तुलसी प्रेम पयोध की ताते नाप न जोख।।
चातक पक्षी के चित्त (मन) को उसकी प्रिय बादलों में दोष कभी दिखाई नहीं देते। तुलसीदास जी कहते हैं प्रेम के सागर की कोई माप नहीं है।
इसी तरह प्रेमिका के प्रिय में दोषों में भी गुण ही दिखाई देते हैं क्योंकि उस अगाध प्रेम के सागर में वे विलीन हो जाते हैं, वे प्रिय को देखते ही रहते हैं, रसखान जैसे प्रेमी की स्थिति कैसी होती है, वे स्वयं कह रहे हैं –
काहू सो मोई कहा कहिए, सहिए जो सोई रसखान सहावे।
नें कहा जब प्रेम कियो, तब नाचिए सोई जो नाच नचावे।।
किसी से मैं क्या कहूँ? रसखान कवि कहते हैं, जिसे सहने के लिए कहा जाता है, उसे सहना ही है, जब प्रेम किया, तब नियम कहाँ? तब जैसे नृत्य कराते हैं, वैसे ही नृत्य करो।
चाहत है हम और कहाँ सखी, क्यों हूँ कहूँ प्रिय देखन पावे।
चरिये सो गोपाल रच्यो तौ चलौरी सब मिलि चेरी कहावे।।
हे सखी! मुझे और कुछ कहना है, लेकिन क्यों कहना है! प्रेमी को देखना अच्छा होता, नहीं? चलो जैसे गोपाल ने रचा है, वैसे ही हम सब मिलकर कृष्ण के दास बन जाएं।
इसी तरह भरत जैसे भक्त के हृदय में प्रेमाग्नि, राम चरणों के दर्शन से प्रकट हो सकती है, इसलिए उन्होंने अपनी दीनता इस प्रकार प्रकट की –
आपनि दारुन दीनता कहऊ सबहि सिरु नाई, देखे बिनु रघुनाथ पद जिय के जरणी न जाई।।
अपने दारुण दीनता को भरत ने सिर झुका कर सबको बता रहे हैं, श्री रघुनाथ के चरणों को देखे बिना, हृदय में मौजूद प्रेमाग्नि नहीं जाती।
और भक्त के हृदय में एक ही तीव्र इच्छा है -
"एकहि आंख इहयि मन माहीन प्रात:काल चलिहुन प्रभु पाहि।" एक ही इच्छा इस मन में है प्रभु को प्रात:काल जाकर प्राप्त करना। यह एक भक्त का (हृदयोद्गार) हृदय की वेदना है, जहाँ जीवन में वही इष्ट (प्रेमिका) व्याप्त हो गया।
एक विचारक ने लिखा – वास्तव में हम असल में कौन हैं? हमारी मूल प्रकृति क्या है? इसका अनुभव मनुष्य को सूक्ष्मावलोकन के समान मिलता है। खाली समय में हम क्या करते हैं? एकांत में हमारी रुचि कैसे गहराती है? जैसे भोजन करने वालों को हर कौर के साथ संतोष, पुष्ट, और क्षुधा निवृत्ति, तीनों प्राप्त होते हैं, वैसे ही मनुष्य भगवान की शरण में जाकर उनका ध्यान करता है। उसे ध्यान के हर क्षण में भगवान पर प्रेम, अपने प्रभु के स्वरूप का अनुभव और संसार की सभी बातों से वैराग्य, इन तीनों की प्राप्ति होती है। वास्तव में यह मन बहुत चंचल, चपल, तेज, बलशाली और जिद्दी है, इसे वश में करना बहुत कठिन है लेकिन वैराग्य और अभ्यास द्वारा इसे वश में लाया जा सकता है। इंद्रियों को वश में रखकर मन को नियंत्रण में रखना संभव नहीं है, लेकिन मन को वश में रखकर इंद्रियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है। प्रेम के झंडे को ऊँचा उठाते हुए उस "ब्रज" में रहने वाली पढ़ी-लिखी गोपियाँ अपने मन को कृष्ण को समर्पित कर देती हैं और उसी कारण उस परब्रह्म परमेश्वर को, मठ्ठे से भरे छोटे बर्तन पर नृत्य करवा देती हैं। समर्पण तो गुरु कृपा से ही संभव है, शिष्य का प्रयास काम नहीं आता। "गुरु कृपा ही केवल" यही एक सहारा है।
परम भागवत पंडित जी महाराज की अमोघ वाणी में गुरु का आशीर्वाद दर्शन ही दिखाई देता है, इसलिए उन्होंने लिखा – "विशाल वृक्ष के सामने उस बीज को पृथ्वी माता के गर्भ में कुछ दिन रहना पड़ता है, वही आशीर्वाद दिया। फिर वह उस विशालता को प्राप्त करता है। इसलिए तुम किसी के चरणों में छिपकर बैठो, एक दिन वे आशीर्वाद देकर तुम्हें ऊपर उठाएंगे। अपने आप को अपने सिर पर उठाने से कोई नहीं बढ़ता।
एक शायर की साहित्यिकता इसी के लिए प्रेरित कर रही है
मिटा दे अपनी हस्ती को, गर कुछ मर्तवा चाहें।
कि दाना खाक में मिलकर, गुल-ए-गुलजार होता है।।
अपनी अहमियत को कभी-कभी मिटा दो, क्योंकि बीज
मिट्टी में मिल जाने पर ही फूलों का बाग तैयार होता है।
कार्लाई के विचार में – "Love unexpressed is sacred." अव्यक्त प्रेम ही पवित्र है। जिनके हृदय में कोई भी पीड़ा है, वे जहाँ भी गिरते हैं, वहाँ चिल्लाते नहीं, गलियों में चिल्लाते, वे ही घूमते रहते हैं। जिनके हृदय में उस प्रेम के मधुर रस से युक्त "ओह" शब्द नहीं आता! ऐसे प्रेमियों का दर्शन कहाँ?
दादू जी महाराज की वाणी द्वारा प्राप्त संकेत को देखो –
अंदर पीर न उभरै, बाहर करै पुकार।
दादू सो क्या करि लहै, साहिब का दीदार।।
तात्पर्य-- अंदर कोई पीड़ा नहीं, बाहर चिल्लाते हैं ऐसे लोगों के लिए, दादू जी कहते हैं साहिब का दर्शन क्यों नहीं मिलता?
दीपक घर के अंदर निश्चल और स्थिर रहता है, दरवाजे पर आने पर उसकी ज्योति, क्षीण हो जाती है या बुझ जाती है। वास्तव में पवित्र प्रेम एक दीपक के समान है। इसलिए कहा गया प्रेम तो मूक है। एक पश्चिमी विचारक क्या कहता है – Love’s tongue is in the eyes। तात्पर्य प्रेम की जीभ आँखों में होती है, यहाँ आँखें ही बोलती हैं, जीभ नहीं। जो लोग उस प्रिय को देख चुके हैं, वे और कुछ नहीं कहते, अपने ही बारे में घूमते रहते हैं, उनके लिए उनका दर्शन नहीं होता।
कबीर साहब की साखी प्रकट कर रही है---
जो देखे सो कहि नहीं, कहि सो देखे नहीं।
सुनै सो समझावै नहीं, रसना दृष्ट श्रुति काहि।।
तात्पर्य --- जो देखने वाले हैं, वे नहीं कहते, जो कहते हैं, वे नहीं देखते, जो सुनते हैं, वे समझाने के लिए नहीं कहते, क्योंकि जीभ के लिए आँखें, कान कहाँ?
वास्तव में, वह प्रेम तो अत्यंत गोपनीय है। ऐसी प्रेम को परा भक्ति कहते हैं, जो सब चीजों से ऊपर आती है। प्रेम का अत्यधिक अनुभव ही परमात्मा है। प्रेम करो, प्रेम करते रहो, अपने बच्चों, पत्नी, परिवार, सभी प्रियजनों, मनुष्यों, पशुओं, वृक्षों – पेड़ों, पर्वतों, हर जगह उस प्रेम को फैलाओ। जैसे-जैसे इस प्रेम का व्यवहार-क्षेत्र बढ़ता है, वैसे-वैसे उनमें परमात्मा का दर्शन एक झलक में दिखाई देने लगता है। परम समर्थ गुरु महाराज इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं --- ईश्वर प्रेम चाहता है, प्रेम की नाड़ी मनुष्य में छिपी हुई है। परमात्मा कहता है मुझसे प्रेम करो, सबको प्रेम करो, खुद को तुम ही प्रेम करो, लेकिन हम ही अपने शत्रु बनकर बैठे हैं..... स्त्री, धन, संतान, वैभव, परिवार, जातियों के जाल में मनुष्य को क्यों फंसाया गया है ताकि वे प्रेम करना सीखें, प्रेम का स्रोत टूट जाए, बिखर जाए और उससे प्रेम, धार के रूप में प्रवाहित हो, फिर उसे दूसरी ओर मोड़ना है – बस, काम पूरा हो गया। घोड़ा दक्षिण दिशा की तीव्र गति से दौड़ रहा था, आँखें खोलते ही वह उसी गति से उत्तर दिशा की ओर दौड़ने लगता है। ....जिन्हें इस सृष्टि में मौजूद प्राणियों पर प्रेम नहीं है, भगवान द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर प्रेम नहीं है, ऐसे कठोर हृदय वाले मनुष्यों के लिए ईश्वर का दर्शन सौ जन्मों में भी असंभव है।
वस्तुतः गुरु ही प्रेम का स्रोत है, किसी भी कठोर हृदय वाले व्यक्ति के लिए, जब वह इस प्रकार के समर्थों की शरण में जाता है, नम्रता, सरलता, स्वाभाविकता प्राप्त होती है। अंगुलिमाल, वाल्मीकि, जैसे लोग कौन थे? क्षण मात्र की प्राप्त सान्निध्य से बदल गए। गुरु तो अगाध प्रेम के सागर हैं, प्रेम को बांटते रहते हैं, वे प्रेम के रसायन हैं।
प्रेमाम्बुधिं प्रेम रसायनंच प्रेम प्रदाम निधिमद्वितीयम्।
मृत्युः जयम् मृत्यु भयापहारं श्री सत्य देवं नितराम नमामि।।